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थॉमस कप 2026: कांस्य जीतकर लौटे भारतीय शटलरों का दर्द, एयरपोर्ट पर नहीं मिला स्वागत

भारतीय बैडमिंटन के लिए थॉमस कप 2026 एक और गौरवपूर्ण अध्याय लेकर आया, जब भारत ने प्रतिष्ठित टूर्नामेंट में कांस्य पदक जीतकर दुनिया के सामने अपनी ताकत साबित की। लेकिन इस उपलब्धि के पीछे छिपी खिलाड़ियों की पीड़ा ने देश की खेल संस्कृति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
भारतीय स्टार शटलर Satwiksairaj Rankireddy, Chirag Shetty और H. S. Prannoy के हालिया बयान इस बात का संकेत हैं कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का नाम रोशन करने वाले खिलाड़ियों को आज भी वह सम्मान और पहचान नहीं मिल पा रही, जिसके वे वास्तविक हकदार हैं।
डेनमार्क में शानदार प्रदर्शन के बाद जब भारतीय टीम स्वदेश लौटी, तो हैदराबाद एयरपोर्ट पर उनका स्वागत करने के लिए न कोई भीड़ थी और न ही कोई विशेष इंतजाम। सात्विकसाईराज रंकीरेड्डी ने अपनी निराशा जाहिर करते हुए कहा कि सात घंटे की लंबी उड़ान के बाद एयरपोर्ट पर किसी ने यह तक नहीं पूछा कि वे कौन सा मेडल जीतकर लौटे हैं। उन्होंने यह तक कह दिया कि मौजूदा परिस्थितियों को देखकर वह अपने बच्चे को बैडमिंटन खेलने के लिए प्रोत्साहित नहीं करेंगे।
यह बयान केवल व्यक्तिगत भावनाएं नहीं, बल्कि भारतीय खेल व्यवस्था के लिए एक चेतावनी की तरह देखा जा रहा है। जिस समय देश में आईपीएल और राजनीतिक चर्चाओं का शोर था, उसी समय भारत के लिए पदक जीतकर लौटे खिलाड़ी खुद कैब बुक कर अपने घर जाने को मजबूर थे। टीम के अनुभवी खिलाड़ी Kidambi Srikanth और Dhruv Kapila भी इसी उपेक्षा का हिस्सा बने।
चिराग शेट्टी ने भी साफ शब्दों में कहा कि भारत अभी पूरी तरह “स्पोर्टिंग नेशन” नहीं बन पाया है। उनके अनुसार, सरकार और खेल संस्थाओं के प्रयासों के बावजूद आम लोगों के बीच बैडमिंटन की उपलब्धियों को वह महत्व नहीं मिलता, जो क्रिकेट को सहज रूप से प्राप्त हो जाता है। उन्होंने कहा कि कई लोग आज भी थॉमस कप को बैडमिंटन के “वर्ल्ड कप” के रूप में नहीं देखते।
वहीं एचएस प्रणय ने कहा कि थॉमस कप जैसे टूर्नामेंट में खिलाड़ी व्यक्तिगत उपलब्धियों से ऊपर उठकर देश के लिए एक टीम के रूप में लड़ते हैं। ऐसे में जब इतनी बड़ी सफलता के बाद भी अपेक्षित सम्मान नहीं मिलता, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा कमजोर पड़ने लगती है।
भारतीय बैडमिंटन टीम की यह पीड़ा केवल खिलाड़ियों की शिकायत नहीं, बल्कि देश की खेल संस्कृति का आईना है। यदि अंतरराष्ट्रीय मंच पर तिरंगा बुलंद करने वाले खिलाड़ियों को उचित सम्मान नहीं मिलेगा, तो भविष्य में युवा प्रतिभाओं को खेलों की ओर आकर्षित करना बड़ी चुनौती बन सकता है।

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