Uttar Pradesh

डायमंड बॉल’ – एक स्वदेशी विरासत का वैश्विक उदय

इतिहास और पुनर्जीवन: ‘गुरखी गोला’ से ‘डायमंड बॉल’ तक
​भारतीय माटी के खेलों में वह शक्ति है जो न केवल शरीर को मजबूत बनाती है, बल्कि हमारी संस्कृति को भी जीवित रखती है। ऐसा ही एक खेल है ‘गुरखी गोला’, जो लगभग 75 वर्ष पूर्व ताजनगरी आगरा की तहसील सैया के गाँव सोरा की गलियों और आसपास के अंचलों में अत्यंत लोकप्रिय था। समय के साथ आधुनिकता की चकाचौंध में लुप्त हो रहे इस पारंपरिक खेल को नया जीवन देने का संकल्प ‘डायमंड बॉल एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ ने लिया।
​प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी के ‘स्वदेशी खेलों को बढ़ावा देने’ के आह्वान से प्रेरित होकर, राष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी और वर्ल्ड डायमंड बॉल के फाउंडर श्री राजीव सोई ने इस खेल को पुनर्जीवित किया। उन्होंने दिलीप शर्मा जी के पूर्वजों द्वारा खेली जाने वाली इस खेल परंपरा को आधुनिक खेल विज्ञान के साथ जोड़कर ‘डायमंड बॉल’ के रूप में इसका पुनर्जन्म किया।


आधुनिक और वैज्ञानिक स्वरूप
​आज का ‘डायमंड बॉल’ केवल एक पारंपरिक खेल नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप ढाला गया एक वैज्ञानिक खेल है। तकनीकी अधिकारी डॉ. देशदीपक कुलश्रेष्ठ के मार्गदर्शन में इसके नियमों को नया स्वरूप दिया गया है:
मैदान: 34×22 मीटर का सुव्यवस्थित कोर्ट।
अवधि: 10-10 मिनट के 4 रोमांचक क्वार्टर।
खिलाड़ी: 7-7 खिलाड़ियों की दो टीमों के बीच कड़ा मुकाबला।
​तकनीकी बदलाव: पुराने लकड़ी के बॉक्स का स्थान अब आधुनिक ‘डायमंड रिंग पोल’ ने ले लिया है, जो इस खेल को और अधिक चुनौतीपूर्ण और आकर्षक बनाता है।
​विकास के मील के पत्थर
​इस खेल की यात्रा आगरा के बलूनी स्कूल ऑफ कॉम्पटीशन में आयोजित भव्य डेमोंस्ट्रेशन मैच से शुरू हुई, जहाँ 10 राज्यों के प्रतिनिधियों और 200 से अधिक खिलाड़ियों ने अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया।
​आधिकारिक पंजीकरण: 30 अप्रैल 2026 को ‘अंडर सोसायटी एक्ट 1860’ के तहत संघ को आधिकारिक मान्यता प्राप्त हुई।
​विश्व दिवस: संघ के कोषाध्यक्ष चौधरी मो. अहमद खान की घोषणा के अनुसार, प्रत्येक वर्ष 15 अक्टूबर को ‘विश्व डायमंड बॉल दिवस’ के रूप में मनाया जाएगा, जो इस खेल की स्थापना और उसकी वैश्विक पहचान का प्रतीक होगा।
हमारा संकल्प और लक्ष्य
​”खेल पुराना, अंदाज नया” और “तन स्वदेशी, मन स्वदेशी, तो फिर क्यों न खेलें खेल स्वदेशी” के नारों के साथ, हमारा उद्देश्य इस खेल को गाँव की गलियों से निकालकर ओलंपिक के भव्य मंच तक पहुँचाना है। आगरा की माटी से उपजा यह खेल अब विश्व मानचित्र पर अपनी चमक बिखेरने के लिए तैयार है।
​महासचिव श्री दिलीप शर्मा और संघ के समस्त पदाधिकारी जैसे धर्मेंद्र बघेल, संजय नेहरू, संतोष कुमार और अन्य सदस्य इस विरासत को सहेजने और इसे नई पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं।

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